“आटा साटा एक कुप्रथा"
आटा-साटा प्रथा
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म्हारे बाबोसा तो रुपिडा़ रा लोभी राज,
मायड़ म्हारी बिंदणी री भुखी सा राज।
गंगा ने जमना तो म्हारे अखियाँ सूँ बहाई,
गंगा रे जमना सांगे म्हाने भी परणाई।
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यह मारवाड़ में लगभग हर जाति में प्रचलित हैं कुम्हार (प्रजापति), राज पुरोहित, देवासी और भी
इस प्रथा में बेटी के बदले बेटी दो आपके घर की बेटी हमारे घर की बहू और हमारी बेटी आपके घर , आपके घर बेटी नहीं है तो पैसे दो अर्थात बेटी के पैसे लेते या पर दहेज प्रथा के विपरित हुआं लड़की वालें पैसे लेते हैं मतलब तो यही हुआ लड़की को बेचना (म्हारा बाबोसा रुपिडा रा लोभी राज,)
आटा साटा होने पर सामने वाले घर की बेटी की तो उम्र है शादी की, उसका ब्याव होने पर आपके घर की बेटी छोटी होने पर भी उसकी भी शादी करनी पड़ेगी भले छोटी क्यु न हो (म्हारी मायड़ तो बिंदणी री भुखी सा) जब माँ बहू को घर लाएगी तो अपनी बेटी को भी ससुराल भेजना पड़ेगा भले उसकी उम्र कम हो ।
मतलब यदि आपको बहू चाहिए तो आपकी बहन बेटी उनके घर देनी पड़ेगी ।
वो दोनों ही एक दुसरे की नणद भाभी होगी ।
जैसे मेरी मामी हैं और ऐसे मेरी बुआ लगती हैं।
जैसे और साधारण भाषा में समझाऊं तो
मेरे भाई की पत्नी आएगी तो मुझे मेरे भाभी के भाई के साथ शादी कराई जाएगी । मतलब आपकी बेटी हमारे घर और हमारी आपके घर और यह जरूरी थोड़ी है दोनों जोड़े अच्छे हो फिर एक के टुटने पर दुसरी का भी तोड़ा जाता है भले ही वो बच्चों की मां क्युं न हो ।
यह बहुत बड़ी कुप्रथा हैं जो हर समाज में चल रही हैं।
इस से एक फायदा यह है कि इस कारण लोग कम से कम बेटी को जन्म तो दे देते । साटे देने के लिए काम आएगी।
और समाज में बेटा बड़ा हैं और बड़ा साटा नहीं है छोटी छोटी बाला है तो दो बेटी देनी पड़ेगी ।
यह प्रथा बेटियों की कमी के कारण तो नहीं है मानसिक विकलांगता के कारण हैं।
बाईसा री कलम स्यूं दीप ✍️
दीपिका हिंदुस्तानी 🇮🇳
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