एक डर

 जब कभी स्कूल काॅलेज से लेट हो जाती , माँ काॅल पे काॅल लगाती , उनकी फिक्र करना हमें कई बार अच्छा नहीं लगता था । कई बार काॅल लेते ही नहीं थे, और ले भी लेते तो कहती थी आ रही हूँ , छोटी बच्ची नहीं हूँ अब । कभी कभार देरी हो जाती है , काॅल पे काॅल क्या लगा रखा है। तब नहीं पता था प्रेम क्या होता हैं , और ना माँ ने समझाया , वे जानते थे उम्र होने पर सब समझ जाएगी। माँ हमसे प्रेम करती है , उन्हें हमारी फ़िक्र हमेशा लगी रहती है। आज जब तुम्हें कभी काॅल करते और तुम नहीं उठाते , सच मुझे भी उतना ही डर लगता है , जितना माँ को लगता था , हमारे देर हो जाने पर । तुम्हारा लेट रिप्लाई आना , मेरे मन में कभी शक़ की घण्टी नहीं बजाती , लेकिन एक डर हैं जो दिलो-दिमाग में छा जाता । कभी कभी तुम्हारी उतनी फिक्र होने लगती है , जितनी माँ को होती थी । आज समझ आता है कि मन तब कैसे हिलोरें लेता था । सच कई बार बहुत डर जाती हूँ, अब इस जिंदगी में पाने के लिए तो बहुत कुछ है , पर खोने के लिए सिर्फ तुम हो। जिसे मैं कभी खोना नहीं चाहती।

 सोचती हूँ कई बार कि बात करूँ ही नहीं , लेकिन ५ घण्टे से ज्यादा नहीं रोक पाती हूँ खूद को, एक पल में ही मन‌ में सारे उल्टे-सीधे विचार इकट्ठे हो जाते हैं। पहला विचार यही होता कि आज हाल नहीं पूछा पता नहीं कल हाल पूछने की वजह हो ना हो ... पता नहीं क्या , कभी कभी कुछ समझ नहीं आता ।


तुम्हारा बिन बताए कहीं जाना , और लोगों के मुंह से तुम्हारा हाल जानना सच अंदर तक झकझोर कर देती हैं। तुम कहते हो ना कितना प्यार करती हो ? जितना माँ करती है मुझसे मैंने वो सारा प्रेम तुम्हारे लिए संजोए रखा था , अब तूम्हें दे रही हूँ .. माँ से थोड़ा अलग करती हूँ । माँ को यह पता था कि हम एक दिन बड़े होकर दूर चलें जाएंगे , लेकिन मुझे नहीं पता तुम्हारे दूर जाने का ना कभी ऐसा कोई ख़्याल आया । 

और उतना ही भरोसा करती हूं जितना एक बाप करता है अपने दामाद पर ... ज्यादा कुछ बन पाई या नहीं पर माँ बाबा की थोड़ी छवि जरूर समेट लाई हूँ।

© दीपिका हिंदुस्तानी


#दीपालित 

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