साट्टो
म्हाने साटो चहिजै" म्हारे बदले में म्हारे जेडी ही इक नारी , पण म्हैं नि मांगू थारी बेहण ने...... केहवे हैं हर पुरुष माँय इक स्त्री होवे , जो स्त्री ने हमझ सके , मने थारे भीतर बस्योड़ी उण स्त्री रो मन चहिजै.... हाँ म्हाने साटो चहिजै!! इक सुटकेस भर ने पईसा चहिजै.. जिण माथे गाँधी नि होवे , होवे उण माथे छाप्योड़ी प्रेम सूं लिखी कवितावां चहिजै..! सिणजारो म्हाने भी चहिजै मूंगा मोल रो ... जिण री किमत तक कोई न पूंग सके... काजल री डिब्बी नि मांगू म्हैं ,म्हैं मांगू सजण थारी मूरत हर पल आँख्याँ में सजे.....! थै दिज्यों म्हाने सारी खुसी हर नेन्हा मोटा बक्सा में, भर थारों मतवालोपण अ'र थारों भोळोपण थोरों थोरों अल्हड़पण थारी कमियाँ रे साथ म्हारा रेजियों....! सात आठ लाख रुपयों सूँ मानूँ कोनी मैं.......... दस- बीस बक्सा भर ने आइजो , जिण में भरी पड़ी हो थारी सगळी खुशियाँ.... छोटा मोटा खोना में छुपाया हुआ दुःख , अधूरा रीया सुपणा, थारो डर , थारो राज़ जो थै अजै तक किण सूं भी नि कह्यों वे सब म्हारा हैं आज ती.....! वे तो बिल्कुल लेणो नि भुलू जै बंद म...